History

मुल्क हिन्दुस्तान जो हिमालय की बर्फ पोशवादियों से लेकर बंगाल के सहरार्इ तक फैला हुआ है। इस मुल्क के सूबा उत्तर प्रदेश जिसकी बहिश्त भारत में धड़कते हुए दिल की तरह है। इसके मशरिकी (पूरबी) किनारे जिला अम्बेडकरनगर के बसखारी-जलालपुर मार्ग पर 02 किमी0 दक्षिण पर किछौछा मुकदिदसा में सैय्यद हज़रत मखदूम अशरफ जहांगीर सिमनानी का मज़ार शरीफ और आस्ताना है, जहां हिन्दुस्तान के कोने-कोने से लेकर विश्व के कर्इ देशों से परेशान हाल लोगों-दुखियारों के आने और मन्नतें पूरी होने के बाद खुशी के आंसू बहाते हुए यहां से विदा होने का 808हिजरी यानी कि 626 वर्षों से विदा होने का सिलसिला बदस्तूर जारी है।

हज़रत मखदूम अशरफ समनान के आदिल खुदा तुर्स और फकीर दोस्त हुक्सरा सै0 मोहम्मद इब्राहीम नूर बख्शी रहमतुल्लाह अलैह के साहबजादे, हज़रते खुदैजा के आंखों के तारे और इब्राहीम दरवेज के पेशीनगोइयों का जगमगाता हुआ एक नायाब आइना है। इसमे कोर्इ शक नहीं कि यह आस्ताना सिसकती, बिलखती हुर्इ लाखों जिन्दगियों को फैज़ पहुंचाता है। इसलिए हिन्दुस्तान में ही नही बलिक पूरी दुनिया में किछौछा दरगाह शरीफ को रूहानी इलाज का मरकज़ कहा जाता है, जिसकी शानो शौकत आन-बान व खूबी देखने से पता चलता है, कि इसे विश्व प्रसिद्ध सूफी सन्त हज़रत मखदूम अशरफ जहांगीर सिमनानी ने आम जनमानस के फैज एवं सांस्कृतिक बहुलतावाद को सुदृढ़ करने के लिए अपने जीवनकाल में ही तामीर करा दिया था। जिसके फैज़े रूहानी एवं विश्व बन्धुत्व तथा सांस्कृतिक बहुलतावाद से हिन्दुस्तान ही नहीं बलिक पूरी दुनिया जगमगा रही है।

हज़रत मखदूम साहब के इसी विश्व बन्धुत्व विश्व शानित एवं समग्र बहुलतावादी सांस्कृतिकवाद को समंजित करने वाली प्रेरणादायक विचारों के कारण ही इनका नाम जहानिया जहागरत पड़ा। आसेब ज़दा वर्स के मरीज, जादू, सहर हो कि जिस्मानी परेशानी में हैं आप के दर पर हर व्यकित आकर मत्था टेकते हैं और कामयाब होकर जाते हैं। हिन्दू मुसिलम सिख इसार्इ अच्छे बुरे हर जाति के लोग, हर बिरादरी के लोग, हर शहर व मुल्कों यूरोप, अफ्रीका, खाड़ी देश के लोग आपके आस्ताने पर आते हैं और फैज़ पाते हैं। ऐसी अज़ीम दरगाह, जहां पर रोज़ 40 हज़ार आदमी मौजूद रहते हैं, कुछ तो है यहां जो उन्हें यहां खींचकर लाता है।

हज़रत मखदूम साहब का देहान्त जब हुआ यह 808हिजरी का ज़माना था, उनकी मृत्यु के बाद भी करोड़ों जि़न्दगियों को आपकी दरगाह से फैज़ पहुंचता रहा है। इसीलिए आपकी दरगाह शरीफ को रूहानी इलाज का मरकज़ कहा जाता है, जो बदस्तूर फैज़ का सिलसिला आज तक चल रहा है। आपकी मृत्यु के बाद वर्ष भर आपकी याद में मेले एवं धार्मिक आयोजनों का सिलसिला बदस्तूर जारी है जिसमें प्रमुख रूप से मुहर्रम में उर्स तथा अगहनिया, अजमेरी, गुश्ल का आयोजन, अत्यन्त महत्वपूर्ण है। न केवल इस देश के बलिक विश्व के कोने-कोने से लोग आपके धार्मिक आयोजनों में समिमलित होते हैं आपके उर्स में लगभग 8से 10 लाख लोग समिमलित होकर अपनी मन्नतों को पूरा होने के लिए दुआएं करते हैं। इन धार्मिक आयोजनों के अतिरिक्त पूरे विश्व की ऐसी पहली दरगाह है जहां आपके मानने वाले अपने फैज के लिए 40 दिन तक दरगाह शरीफ में रूककर रूहानी इलाज के सिलसिले में मन्नते करते हैं। जिनकी संख्या कम से कम 35 से 40 हजार व्यकितयों की होती है। इस सिलसिले में ऐसी विश्व की पहली दरगाह है। जिसका बदस्तूर सिलसिला लगभग 626 वर्षों से आज भी चल रहा है।

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मुल्क हिन्दुस्तान जो हिमालय की बर्फ पोशवादियों से लेकर बंगाल के सहरार्इ तक फैला हुआ है।
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